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Random Thoughts of a Scrambled Mind

Dehradun

खिड़की के बगल में बैठ कर,
इस छनी हुई धूप को देख कर,
इस हलकी सी शीत पवन को महसूस कर,
दूर कहीं गरजते बादलों को सुन कर,
मुझे याद तेरी आती है ।

खिड़की के बगल में बैठ कर,
दूर गगन में पहाड़ों को देख कर,
शीघ्र आने वाली वर्षा को महसूस कर,
चहचहाते पंछियों का संगीत सुन कर,
मुझे याद तेरी आती है ।

खिड़की के बगल में बैठ कर,
हर ओर लहराहते हुए वृक्षों को देख कर,
इस सुखद एकांत को महसूस कर,
और इस को कभी कभी भंग करने वाली मोटर कार की आवाज सुन कर,
मुझे याद तेरी आती है ।

बहुत समय गुज़र गया मेरे दोस्त,
जल्द ही वापस बुला ले,
कहीं ये यादें धुंधला ना जायें ।

Posted by Rahul on May 24, 2012 | Posted in Random Ramblings | Tagged , | 2 Comments

In search of sleep

सारी रात जाग कर बिताई
नींद ने हर क्षण डांट लगायी
इस नादान को फिर भी समझ ना आई |

अब डर ने हर कोने में है सेंध लगायी
काम के बढ़ते भोझ ने मुझे आँख दिखाई
इसी कारण मुझे नींद नहीं आई |

निरंतर धीरे चलते डब्बे ने भी नज़र चुरायी
घडी की सुइय्याँ दिखा गुहार लगायी
मुझे फिर भी नींद ना आई |

आँखों में है अब सुर्खी छाई
ऐनक भी उतारकर मेज़ पर है टिकाई
पर ज्ञात नहीं की नींद आई या नहीं आई ||

Posted by Rahul on December 22, 2011 | Posted in Random Ramblings | Tagged , | Comment

HMS Ulysses …

A very good book, but it was the reference to Ulysses (Tennyson) that still remains fresh even after having read the books nearly 6 years ago…

Come, my friends,
‘T is not too late to seek a newer world.
Push off, and sitting well in order smite
The sounding furrows; for my purpose holds
To sail beyond the sunset, and the baths
of all the western stars, until I die.
It may be that the gulfs will wash us down:
It may be we shall touch the Happy Isles,
And see the great Achilles, whom we knew.
Tho’ much is taken, much abides; and tho’
We are not now that strength which in old days
Moved earth and heaven, that which we are, we are;
One equal temper of heroic hearts,
Made weak by time and fate, but strong in will
To strive, to seek, to find, and not to yield.

Posted by Rahul on February 20, 2009 | Posted in Random Ramblings | Tagged | Comment